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Showing posts from October, 2020

महिला सशक्तिकरण

 महिला सशक्तिकरण,पुरुषों के लिए बनती चुनौती,  -महिला सशक्तिकरण के इस पूरे दौर में मूल्यगत चुनौतियाँ जो पारंपरिक जहाँ सभ्यता और संस्कृति का हवाला ,पितृसत्तात्मक समाज पर  गतिरोध उत्पन्न कर रहा है। -नए- नए क़ानून और उनसे उत्पन्न होने वाली स्तिथियाँ महिला और पुरुष दोनों के मानसिक स्तर पर चेतना का पटापेक्ष नए दौर के वातावरण में सामंजस्य बिठाने का प्रयास जो विद्रोह कि प्रगति जहाँ एक ओर सकारात्मक मूल्य लिए हुए हैं और वहीं दूसरी ओर नकारात्मकता की पहाड़ी निर्मित कर रही है। महिला सशक्तिकरण, -सदियों से चलती आई "इनसाइड स्टोरी " जिसपर मानव समाज या यों कहें पितृसत्तात्मक समाज हमेसा पर्दा डालती रही । महिलाओं ने सदियों से पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया न केवल सहायता की अपितु नेतृत्व भी किया । चाहे वह महाभारत की द्रोपती ,कुंती हों या रामायण की कौसल्या ,कैकई या सीता । लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, अहिल्याबाई, झलकारीबाई या फिर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ,इंदिरा गांधी,सोनिया गांधी आदि कई महिलाओं ने समय समय पर अपना जोहर दिखाया राजनैतिक या फिर समाजिक रूप से । - स्वतंत्रता के बाद क्रमशः महिला ...

बढ़ते अवरोध के बीच पराली

 पराली ,   -धान आदि फसलों के मुख्य भाग जहाँ पर दाने होते हैं उन्हें काटकर शेष भाग को अवशेष के रूप में छोड़ दिया जाता है उसे पराली कहते हैं। - जिसका व्यापक रूप -पंजाब ,हरियाणा ,उत्तर प्रदेश का पश्चमी भाग ,राजस्थान का कुछ हिस्सा आदि जगहों में पाया जाता है।  -पराली अर्थात अवशेष का जलना या जलाना एक प्रमुख घटना है जिसे आजकल दिल्ली स्मॉग के नाम से भी जाना जाता है जो सितम्बर के मध्य से सुरू होकर ऑकटुम्बर नवंबर तक चलता है जब तक कि पराली जलकर खत्म न हो जाये। पराली या यों कहें फसल का यह अवशेष दौड़ती ,भागती जिन्दगी का पर्याप्त परिचायक है ,जहाँ व्यक्ति के पास कमोबेश अनेक तरक़ीब हैं जहां वह अपने समय को बचाकर अन्य कार्यों में लगाता है ,इस जल्दबाज़ी में उससे कभी कभी इतनी बड़ी भूल हो जाती है जिसका खमियाजा सबको भुगतना पड़ता है । पराली क्यों चंद राज्यों की समस्या है यह तो पूरे देश की समस्या होनी चाहिए । परंतु यह जानना भी आवश्यक है कि पराली केवल पंजाब ,उप्र,हरियाणा, दिल्ली की समस्या है या पूरे देश की तो मैं आपको अवगत करा दू की खेती की पारंपरिक व्यवस्था के बीच फॉर्मिंग जैसे उत्कृष्ट प्रणाली का आगम...

अपराध प्रक्रिया###निवारण

"अपराधिक गतिविधियों का बनता परिवेश" परिवेश वास्तव में व्यक्तिव निर्माण के लिए अति आवश्यक होते हैं। बढ़ती दुनिया में हर किसी की चाह दुनिया होती है चाहे उसकी परिधी सकारात्मक हो या फिर नकारात्मकता के नए आयाम ।  जहाँ बात करें अपराधिकता की तो वह अपना विस्तार कर रही है जैसे मैने पूर्व में कहा था दुनिया। न्यायिक प्रणाली जिसके अंतर्गत जिला न्ययालय, उच्च न्यायालय, या फिर उच्चतम न्यायालय या फिर अन्य न्यायालय जो इनके अधीन हैं ,वे अपराध निरोधक कानूनों को बड़ी दृणता से पालन करवाते हैं चाहे वह  बाल न्याय अधिनियम 1986( जिसके अंतर्गत 8 साल से 16 के किशोर या किशोरी के द्वारा किये गए कानून विरोधी कार्य सम्मिलित हैं),दुष्कर्म से संबंधित बनाये गए कानून  पास्को एक्ट  हो ,चोरी -डकैती, मर्डर,हाफ मर्डर ,धोका धड़ी चाहे अन्य अपराध ,हमारे सांविधान में ढेरों संसोधन और ढेरों नए कानून  हैं जिनका कड़ाई से  पालन करवाते हैं । परंतु अपराधिक गतिविधियों की संख्या में बढ़ोत्तरी  लगातार हो रही हैं,राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो के अनुसार साल 2017 में हुए कुल अपराधों की संख्या 50,07,044 थी जो 20...