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Showing posts from March, 2021
 "उलूल- जुलूल" विधा-निबंध  लिंग समानता की बहती धारा में उभार तल के उबड़-खाबड़ का प्रमुख दोष सदियों से पोषित इस मानव समाज में पनपता रहा । आज के संदर्भ में लिंग असमानता की गहरी खाई प्रशासनिक शब्दावली में भर रही है ,जहाँ मानवाधिकार को लेकर रोज नए मांग के बीच कानून का बढ़ता कागजी रूप फिर उसकी जमीनी पृष्ठभूमि स्पष्ट है। लड़का -लड़की का रूप आगे जाकर विभिन्न सम्बधों में बंधते हैं वहीं संबंधों के आड़ में पुष्ट होती पितृसत्तात्मक समाज इसके आंतरिक विरोध के नए आयाम बुन रही होती है। विरोधाभाष के दौर में समानता की गाड़ी बड़ी तेजी से समाज ,क्षेत्र,कस्बा,राज्य से लेकर पूरे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रही है ,परंतु पुष्ट होती मानसिक असमानता का दायरा भी स्पष्ट है । 'माँ-बाप के नाजायज़ संबंध बच्चों के  बचपन के साथ पूरी जिंदगी में सेक्स का सामान्यीकरण या यों कहें साधारणीकरण होता दिखता है,जो एक प्रमुख समस्या बनकर आज के समाज में स्थापित हो चुकी है।'  स्वतः संबंध चाहे वह स्त्री हो या पुरुष अपने शादी पूर्व जीवन काल में बना सकता है इसकी पूरी छूट कानून देती है जिसका भरपूर फायदा कामोबेस शादी के बाद भी स्त्...