महिला सशक्तिकरण

 महिला सशक्तिकरण,पुरुषों के लिए बनती चुनौती,


 -महिला सशक्तिकरण के इस पूरे दौर में मूल्यगत चुनौतियाँ जो पारंपरिक जहाँ सभ्यता और संस्कृति का हवाला ,पितृसत्तात्मक समाज पर  गतिरोध उत्पन्न कर रहा है।

-नए- नए क़ानून और उनसे उत्पन्न होने वाली स्तिथियाँ महिला और पुरुष दोनों के मानसिक स्तर पर चेतना का पटापेक्ष नए दौर के वातावरण में सामंजस्य बिठाने का प्रयास जो विद्रोह कि प्रगति जहाँ एक ओर सकारात्मक मूल्य लिए हुए हैं और वहीं दूसरी ओर नकारात्मकता की पहाड़ी निर्मित कर रही है।


महिला सशक्तिकरण,


-सदियों से चलती आई "इनसाइड स्टोरी " जिसपर मानव समाज या यों कहें पितृसत्तात्मक समाज हमेसा पर्दा डालती रही । महिलाओं ने सदियों से पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया न केवल सहायता की अपितु नेतृत्व भी किया । चाहे वह महाभारत की द्रोपती ,कुंती हों या रामायण की कौसल्या ,कैकई या सीता । लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, अहिल्याबाई, झलकारीबाई या फिर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ,इंदिरा गांधी,सोनिया गांधी आदि कई महिलाओं ने समय समय पर अपना जोहर दिखाया राजनैतिक या फिर समाजिक रूप से ।

- स्वतंत्रता के बाद क्रमशः महिला सशक्तिकरण के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम1955(जो हिन्दू कोड बिल के अंतर्गत निहित था जिसे बाबा साहेब ने लाया),1961 दहेज निषेद अधिनियम,या फिर 2005 घरेलू हिंसा अधिनियम ,आदि कई अधिनियम और कानून बनाये गए ।


- महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिल सके चाहे वह पढ़ाई में हो ,जमीन जायजाद में हो ,विवाह से सम्बंधित निर्णय की स्तिथि में ,मतदान की स्तिथि में आदि वे सभी पहलू जो महिलाओं और पुरुषों के मध्य खाई उत्पन्न करता रहा है । उसे पाटने का लगातार प्रयास किया जा रहा है ।


- आये दिन शिक्षा,समाज,राजनीति,रक्षा क्षेत्र में,आर्थिक मामले,वैश्विक परिदृश्य के साथ साथ परिवार में महिलाओं का लगातार बढ़ता कद जो स्वतंत्रता,आत्मनिर्भरता की अलख जगाती है वह सब महिला सशक्तिकरण ही है।


महिला सशक्तिकरण पुरुषों के लिए बनती चुनौती,


-जहां एक ओर सदियों से चलती या कथाकथित पितृसत्तात्मक समाज है वहीं सदियों से अपनी अश्मिता और गौरव को आत्मसात किए हुए सशक्त होती महिलाएँ ,जो न केवल घर के अंदर सशक्त हैं अपितु बाहर भी सशक्त हैं।

-सशक्तिकरण पुरुषों के लिए चिंता का कारण बने यह जरूरी नहीं परंतु आये दिन इसके नकारात्मक परिणाम पुरुष जहां शारीरिक रूप से दृण होते हैं उसका दुरुपयोग वह महिलाओं पर कर रहे हैं चाहे वह घरेलू हिंसा हो रेप,या फिर किडनैपिंग या महिला तस्करी से संबंधित मामले।

-  नकारात्मक रूप की यदि चर्चा करें तो पुरुषों के अंदर महिलाओं के लिए लगातार डिजिटल माध्यम के जरिये या यों कहें इस दौर में एक अलग ही द्रष्टिकोण का निर्माण हो रहा है जो केवल भद्दी और बेतहासा ही नहीं अपितु आगामी मानवता की पृष्टभूमि के लिए भी खतरनाक है।

-सकारात्मक रूप से चर्चा करें तो पुरुषों के लिए अपनी अस्मिता या यों कहें आत्मनिर्भरता और संप्रभुता से लबालब दृष्टिकोण को बदलकर समानता और परस्पर सहयोग की शैली को अपनाना एक चुनौती हो गई है।जहाँ उसे महिलाओं के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करना पड़ रहा है।


निष्कर्ष


-लगातार बढ़ते आधुनिकता के बीच जहां डिजिटल माध्यमों ने कल्पना को इसतरह अतिरंजित किया है जो कि नए नए दृश्टिकोण बनाने और वास्तविकता से सामंजस्य बिठाने में स्वतः कठिनाई और चुनौती उत्पन्न कर रहीं हैं । 

- मैं न केवल पुरुषों की निर्लज्जता के बारे में कह रहा हूँ अपितु महिलाएं भी सशक्तिकरण का बेवजह फायदा न उठाएं क्योकि समाज का निर्माण एक परिवार से होता है और उसपर महिलाओं का असर मानसिक रूप से कहें तो बहुत अधिक होता है।

-पुरुषों और महिलाओं के मध्य परस्पर आपसी टकराव चाहें वह मूल्यगत हो या विधिसम्मत या फिर नकारात्मक रूप लिए हुए सरकार और समाज के मध्य कानून बनी रहनी चाहिए।

यह लेखक के अपने विचार हैं ,


अजय कुमार (समसामयिक विश्लेषक)।

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