बढ़ते अवरोध के बीच पराली

 पराली ,

 

-धान आदि फसलों के मुख्य भाग जहाँ पर दाने होते हैं उन्हें काटकर शेष भाग को अवशेष के रूप में छोड़ दिया जाता है उसे पराली कहते हैं।

- जिसका व्यापक रूप -पंजाब ,हरियाणा ,उत्तर प्रदेश का पश्चमी भाग ,राजस्थान का कुछ हिस्सा आदि जगहों में पाया जाता है। 

-पराली अर्थात अवशेष का जलना या जलाना एक प्रमुख घटना है जिसे आजकल दिल्ली स्मॉग के नाम से भी जाना जाता है जो सितम्बर के मध्य से सुरू होकर ऑकटुम्बर नवंबर तक चलता है जब तक कि पराली जलकर खत्म न हो जाये।



पराली या यों कहें फसल का यह अवशेष दौड़ती ,भागती जिन्दगी का पर्याप्त परिचायक है ,जहाँ व्यक्ति के पास कमोबेश अनेक तरक़ीब हैं जहां वह अपने समय को बचाकर अन्य कार्यों में लगाता है ,इस जल्दबाज़ी में उससे कभी कभी इतनी बड़ी भूल हो जाती है जिसका खमियाजा सबको भुगतना पड़ता है । पराली क्यों चंद राज्यों की समस्या है यह तो पूरे देश की समस्या होनी चाहिए । परंतु यह जानना भी आवश्यक है कि पराली केवल पंजाब ,उप्र,हरियाणा, दिल्ली की समस्या है या पूरे देश की तो मैं आपको अवगत करा दू की खेती की पारंपरिक व्यवस्था के बीच फॉर्मिंग जैसे उत्कृष्ट प्रणाली का आगमन जो हमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि देशों से कॉम्पिटिशन करने में सक्षम बनाया। परंतु वहीं इसे केवल सीमित भूभाग तक ही बांध के रख दिया।जिसका उदाहरण मैं पहले दे चुका हूं सम्पूर्ण देश में फार्मिंग खेती नहीं पाई जाती । पराली जलाना और उससे प्रदूषण का फैलना उसी का परिचायक है। यूँ कई सालों से यह सिलसिला चलता रहा परंतु यह मुद्दा केवल स्थानीय बनकर रह गया राष्ट्रीय मुद्दा कभी नही बन पाया यदि यह व्यापक होता तो समय रहते क़ानून का निर्माण हो गया होता । जहाँ एक ओर फार्मिंग खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार के खेती ,किसान आदियों से आधारित विभिन्न बिलों का आना शायद इसके संकेत हैं । परंतु क्या वर्षों से उब्जी इस चुनौती का सामना नही किया जा सकता जो राजधानी को गुलाम बनाई हुई है।जिन राज्यों की देखा सेखी आज अन्य राज्य खेती के यंत्रों का प्रयोग कर रहे हैं कल यदि इसी स्तिथी में आकर खड़े हो गए तो अन्य प्रदूषण को तो छोड़ो वायु प्रदूषण ही हमारी जान ले लेगी। आज फसल काटने,फसल लगाने,फसल बोने आदि के नए नए तकनीक और फिर खाद आदि का प्रयोग  जो पारंपरिक शैली का स्थान लिए हुए हैं,जो तकनीकी के बहाने पर्यावरण को खासा प्रभावित किया है। इसपर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता आज आन पड़ी है ।


यह समस्या आज केवल भारत की ही नही पूरे विश्व की समस्या बन चुकी है पिछले दिनों अमेरिका ने भी भारत के इस अनियोजित कार्य की बड़ी आलोचना की जो हमारे वैश्विक साख को प्रभावित करता है। समय रहते इसपर बेहतर कानून ,और लोगों को जागरूक करना फसल ,खाद ,जिनमें अच्छे किस्मों के विकास करना जिनसे पर्यावरण प्रदूषित न हो ,खेती पर निर्भरता कम करना ,फसल चक्रण की गतिविधियों को बढ़ावा ।

और पराली आदि के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था जिसकी परिणीति प्रदूषण न होकर जैविक अवशेष खाद आदि का निर्माण तभी प्रदूषण की मात्रा में कमी होगी।

यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं।

अजय कुमार( समसामयिक विश्लेषक)।

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