विवाद(सम्बधों में आपसी खटास और प्रेम की अमिट धारा)
एक फुररर...फुररर..सी होती आवाज मेरे कानों से नज़रें चुरा ले गई । मेरी इंद्रियां उसके स्पर्श मात्र से जैसे झंझहनाई सी मध्य में अपने -अपने रेसिडेंस से निकलकर आ ही गए । कहने लगे क्या *इन्द्रियाँ*- तुम्हें पता है कि कहीं पुरवाईयों की बहकती आवाज तंद्रा सी बिल्कुल ज्वालामुखी में उद्गार होते गर्म लावा सी तेरे कानों में आकर जैसे तुम्हें गुलाम बना लिया है। *मेरा प्रीत*- आपस में बात करते हैं,अपना मन लिया और लेकर मेरा नाम कहीं से भी आते शोर को तुम उसका नाम कहोगे,पल-पल मेरी रुन्धती हुई आवाज,शायद तुम्हें नागुजर हो गए होंगे,कहो इसीलिए तुम मुझे निकाल देना चाहते हो। *इन्द्रियाँ*- न ,जी न हमारा बिल्कुल ऐसा मतलब नहीं था ,वो रश्में हैं जो शायद तुम्हारे रूह को पलटने की ताकत रखतीं हैं,जो बार -बार तुम्हें तड़पाकर तुम्हारे राह बुनती हैं,पर जो आज हमने सुना और जैसा महसूस किया है ,बिल्कुल ठीक वैसे जो तुम्हें अक्सर नया लगता है। ओह......, *मेरा प्रीत*- भला तुम्हें क्या मालूम और कैसे ?जो मुझे लगता है सच तो यही है कि मेरी रुधन आपलोगों को बाधित करतीं हैं,अपनी मनमानी के चलते मैंने आप ...