काफिर

काफिर,

मेरी हार मुझे पानी पिला रही तो ठीक ही हुआ जब तक चको चांद काफिर तो हुआ होगा। जन्नत का दरिया बन गया था अमृत ही अमृत मिल रहे थे तुम्हारी सोच बडी रहीसियायी सी  जीव- जगत की बात करने में अंदर लगी आग को भूल ही जा रही थी। अरे ठहरो भाई अभी आज ही तो बाकी है एक का क्या होता है तुम मजमुदार जैसे हम भी चमके रहने दो एकदम झटके तुम जो काफिर बने फिर रहे हो तुम्हारी बरकत में यादों की गहराइयां जो है उसे भूल क्यों रहे हो! तब भी तो तुम शामिल हो किसी अकेले रहीसी की यादें मैंने ही नहीं संजोया है ।कितने अर्से हो गए हैं जंग की तैयारी में जैसे हथियार को जंग लग गया हो। एडवेंचर ना भाई बड़ी दरियादिली होगी 2 -2 मजमुदार रहे हैं किसी एक की भी खातिरदारी होते हम रह गए बस छोड़ जाने में दिल रम रहा है ।खैर !कुछ मत कहो तुम्हारे परिणाम बता देंगे की खातिरदारी किसकी हुई मैं सहसा झलक सा गया हूं मेरी रोए अब जैसे कांप रही हो एक तरफ ज्वालामुखी उद्गार तो दूसरी तरफ ठंडे पानी से सागर। बड़ी रहस्यमयी  फिलॉसफी झाड़ रहे हो मद  में तो हो पर भूल क्यों रहे अंदर की आग अभी बाकी है,जहां रूप नहीं  बस अवशेष  है ।अच्छा ही होगा मित्र मेरी बलैयां तो हजारों ले रहे पर तुम एक हो जो मुझे सच से मिला रहे हो । क्या तुम्हें पता है आ रहे सच का नाम क्या है?

अजय कुमार

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