सेक्सुअल कंसर्न
सेक्सुअल राइट
"जिस तरह समाज में नित नई बातें पैर पसार रही होतीं हैं कुछ हाल दिलों के बेहाल ,बदहाल हो रहे होतें हैं।"
सेक्सुअल राइट आज के समय में एक बड़ा कंसर्न है "say no to sex " without concern is punishable offenceअर्थात बिना इक्छा के सेक्स करना एक दंडनीय अपराध है इसे रेप माना जाता है।
भारतीय परंपरा पर यदि जाएं तो हमें ऐसे कई उदाहरण मिल जाते हैं जहां भारतीय पुरूष में बहुविवाह की प्रवर्ति के साथ-साथ महिला दासों एवं वेश्यावृत्ति की मार्मिक स्तिथि का पता लगता है परंतु सीता, द्रोपती,दिव्या,राधा जैसे काल्पनिक पात्र हमारे सामने आदर्श स्थापित करने का प्रयास करते हैं। परंतु सेक्सुअल थीम पर यदि चर्चा करें तो प्रायः इसे शादी से पहले अपराध की नजर से समाज देखता है परंतु यह शादी के बाद भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभर कर आया है "दिल्ली हर्ट" का वर्तमान निर्णय मैरिटल रेप अर्थात शादी के बाद पति का पत्नी के मर्जी के खिलाफ सेक्स करना रेप माना जाय इसपर पर्याप्त तथा सम्पूर्ण न्याय की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट करे जो याचिकाओं के सापेक्ष निर्णय गौरतलब है कि पुरुष मानवाधिकार के लोग इसे मानने के लिए तैयार हैं पर एक कंसर्न पर की यह न्याय संगत है जहाँ आर्टिकल 14 ,15,19(2) ,21 की बात की जाती है केवल महिलाओं को पीड़ित कहकर पक्षपात जैसे निर्णय न हो और पर्याप्त पुरुषों की दलीलें भी सुनी जाय ।
भारत जैसे विशाल देश जहाँ कानूनन जानकारी के अभाव में न जाने कितनी महिलायें पीड़ित हैं केवल कानून अभाव ही नही सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक ,सांस्कृतिक बेड़ियों के चलते वह उनका शोषण ,घरेलू हिंसा के साथ साथ-साथ 'खुले में सेक्स' जैसे शब्दों की अवधारणा मानवी गरिमाओं के खिलाफ हैं पर्याप्त अर्थ निकाला जाता है । लड़के -लड़कियों के मध्य प्रेम प्रसंग और इस बिच बढ़ते अपराध के बारें में समाज का दृष्टिकोण ऐसा लगता है जैसे पूरा समाज एक तरफ कानून व्यवस्था एक तरफ और ये क्रांतिकारी लोग एक तरफ जो प्रेम की नई-नई पराकाष्ठा लिखते हैं लिख रहें हैं और नागरिक समाज इसे अपराध समझकर चारदीवारी के बाहर इसे घोर सामाजिक गिरावट मान रहा है। म्युचुअल कंसर्न हाय तौबा इश्क़ की चार दिवारी,
बड़े-बड़े हारे हुए हैं इश्क की बेकारी,
कितने होते सेक्स यहां ,न उम्र तकाजा मर्यादा,
नाम इसे केवल दे देते घरेलू हिंसा के तलक म्यूच्यूअल सेक्सुअल राइट,
अधर में मरने वाले लाखों प्यार के दीवाने, न घर -बार पिया बस प्रेम के ही लाने,
वो कह देती पिता नहीं, माता नही परिवार नहीं, न जिम्मेदारी ,
लड़कों का तो हाय तौबा जान रही महतारी,
कूद जाए,जलत अगन में न बुझे घर परिवारी,
अंत होए बस 80% की बेकारी 20%कहत है अब हम हो गए जिम्मेदारी,
भारत देश हाय तौबा ले लडकन की भरमारी,करो जतन एहुँ रेप है भर- दो कानून हमारी।
अर्थात सेक्सुअल कंसर्न की शुरुआत लड़के लड़कियों को उनके एजुकेशनल दौर में अकादेमिक हिस्सा होने चाहिए स्कूलों में पर्याप्त शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए,एवं पर्याप्त वातावरण एवं कानून की स्पष्ट व्याख्या एवं उसका क्रियान्वयन, तभी इस दौर में एक सकारात्मक समाज की कल्पना की जा सकती अन्यथा बाद में यह कहना कि आसामाजिक तत्वों का उभरना ,लड़कियों को समाज के लिए कलंक कहना ,कानून के सामने अपराध कहना,और पश्चिम का हम पर हावी होना कहना सब निर्थक है।
यह लेखक के अपने विचार हैं
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