#हिजाब# विश्लेषण एवं परिणाम"

 "हिजाब"

हिजाब' अरबी का एक शब्द है ,अरबी, उर्दू व्यवहारिक शब्द आते ही सबके मन में इस्लामोफोबिया वाली धारणा आ जाती है ,'हिजाब' और नकाब में प्रायः अंतर स्पष्ट है नकाब जिन्हें अक्सर मुश्लमान महिलाएं पहनती हैं जो परंपरावादी पुरुषों की धारणा है जिसे इस्लाम का हिस्सा बना दिया गया। इसकी इजात में महिलाओं का इससे कोई संबंध नहीं । हिजाब में केवल सिर को ढका जाता है । हिजाब के ही समानार्थी बुर्का, स्कार्प,दुपट्टा, आदि कई शब्द प्रकाश में आते हैं। परंतु वर्तमान में 'हिजाब पर  पर्याप्त विवाद उत्पन्न हो चूका है।

1 फरवरी को विश्व हिजाब दिवस के रूप में मनाया गया । कर्नाटक के एक कॉलेज में हिजाब पहनकर आने वाली मुश्लिम महिलाओं को हिजाब पहनकर आने की स्तिथि में कॉलेज से बर्खास्त कर देने की सख्त हिदायत दी गई । यह सिलसिला अन्य कॉलेजों में भी अपनाया गया इसके विरोध में धरना प्रदर्शन होने लगे । प्रश्न यह उठता है कि क्या इस मामले में जहां हिजाब का ही स्वरूप लेता स्कार्प,,दुपट्टा जो मुश्लिम समाज के अतिरिक्त अन्य समाज की महिलाएं विशेष जरूरत के हिजाब से पहनती हैं  उन्हें भी इस विवाद के श्रेणी में लिया जाय? मामला कोर्ट में है।

हिजाब यदि धार्मिक संकेतक हैऔर इसे मुश्लिम समाज मे रिवाज माना जाता है तो फिर  इसके विरोध का क्या प्रश्न है ।यह केवल एक कॉलेज के स्तर तक बॉयकॉट नहीं किया जा रहा लम्बे समय से मुश्लिम महिलाओं में प्रचलित नकाब,हिजाब को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं ,इसे अनैतिक और महिलाओं को भेदभाव वाली स्तिथि तक पहुंचा देने वाले संकेतक के रूप में लंबे समय से विरोध होते रहे हैं। इश्लामिक देशों में इसे आवश्यक माना गया है और पश्चिम के देशों में इसका बॉयकाट किया जाता रहा है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश होने के साथ -साथ एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भी है अनु.25,26तथा19,21इसके लिए पर्याप्त उपबंध निर्मित करते हैं परंतु 3 स्थितियों में मौलिक अधिकार प्रायः संकुचित हो जाते हैं  'लोकव्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य' इन तीनों ही स्थितियों में यदि मौलिक अधिकार इन्हें भंग कर या फिर  इनके मार्ग में अवरोध उत्पन्न करें तो उस स्थिति में  मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है । वर्तमान के विवाद से यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं होता कि  मुश्लिम महिलाओं का बुरखा,नकाब या हिजाब पहनना किसी के मौलिक अधिकारों का खंडन करता हो या फिर वे 3  उपबंद जिनका उल्लेख मैने ऊपर किया है उसका खंडन करता हो ।यह केवल इतना स्पष्ट अवश्य करता है,  की धार्मिक भावनाओं का उल्लंघन विशेष रूप से, जो समुदाय उस पोशाक या संकेतक को धारण करता है जिसका उल्लेख या यों कहें इजाजत उनकी धार्मिक मान्यता देती हो ,अर्थ स्पष्ट है ।

इस विवाद में यह सामने निकलकर आता है कि किसी भी व्यवहारिक वेशभूषा ,भाषा बोली ,या अन्य संकेतक जो  भौगोलिक,राजनीतक, सांस्कृतिक परिस्तिथियों के अनुसार व्यवहार में सम्मिलित हो चुका है जिसका निर्धारण या विश्लेषण देशकाल के आधार पर प्रायः रूढ़ी या उच्च  मानक के व्यवहार नजर  आते हैं । अतः इन्हें स्वीकारोक्ति के स्तर पर बड़े एवं सामुदायिक भिन्नता वाले राष्ट्र में व्यवहार की भिन्नता एवं अखंडता का सम्मान करते हुए एक विशेषण से परिपूर्ण दृष्टिकोण के निर्माण हेतु प्रयास किया जाना आवश्यक है।

यह लेखक के अपने विचार हैं

अजय कुमार ( समसामयिक विश्लेषक )

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