"बेदम आँसू"
कहीं ख़ुशी कहीं गम, बेहद देख चुके होंगे आप ,मग़र बेदम आँसू का बह जाना,एक रहस्यमयी दास्तान है। जो आपमें मुझमें उन में और कहीं मैं ग़लत नहीं हूं तो उन सब में इस रहस्य का वास होता है।
माना अल्बत्ता ही सहीं पर सहारे की ज़रूरत हर शक्स अपनी सख्शियत के पीछे छुपी अप्रत्यक्ष उदासी और खामोशियों को लेकर हर रोज हर पल महसूस करता है।
विरासत को देखकर कौन नहीं कहेगा कि वो कामयाब शख्सियत हर किसी के लिए तालीम है,उस सख्श की नाकामी जो उसे रोज़ कुरेदती है उसकी इतनी बड़ी सल्तनत को धिक्कारती है,सुकून के महज पल त्याग और तपस्या की हिमायत ,किसी की उझड़ी दास्ताँ बयाँ करती हैं, क्या वो भी तालीम के क़ाबिल है, आप बेशक़ कहेंगें जी हाँ ,वही "बेदम आँसू है"।
बग़ैर कर्म के भला कौन हो सका है इस ज़माने में या उस जमाने में ,कोई कहता है बिना संघर्ष जिंदगी नहीं कोई कहता है सफलता की पहली सीढ़ी बड़ी सोच सोच पाना है कोई कुछ और कोई कुछ और सबके अपने मायने संघर्ष और सफलता को लेकर होती है । जहाँ जीवन कर्मविहीन होकर जड़ता में तब्दील हो जाती है तो जीवन जीने का संघर्ष उसे गतिमय बना देता है परंतु क्या वह रसमय है ?फिर जिम्मेदारी भरी ओट जो दिए के प्रकाश के भाँति प्रज्वल्लित हो रही है और ओट का अंधकारमय रहस्य छुपा हुआ है जो दिए के सारे रस को खींचकर जलने के लिए मजबूर कर देता है ।वहीं नीरसता का संचार आज अद्भुत रूप लेकर यौवनों, किशोरों ,बुजुर्गों में एक माहमारी के तौर पर चल रही है ,जो अद्भुत, अदम्य,अतुलनीय, बेदम आँसूं बिन बुलाए ही एकांत के ओट पर रसमय जीवन को जलाकर प्रकाश प्रज्वल्लित कर रही होती है । सच में मनुष्य तन की ये अपार पीड़ा अपने -अपने आलम्बन या यों कहलें जिसकी आस या खत्म हो जाने की निराशा उसे हररोज़ कुरेदती रहती है और यह जीवन पर्यंत चलते रहता है। कुछ नहीं बस बेदम आँसू
यह लेखक के अपने विचार हैं
"अजय कुमार"
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