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राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद का राजनीतिक महत्व एवं उत्पन्न चुनौतियाँ
राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद को समझने के लिए प्रायः हमारे पास हमारे निजी अनुभव तथा समसामयिक घटना शैली पर्याप्त है । परंतु क्या हम सच में एक राष्ट्र हैं और यदि हैं तो राष्ट्रवादी होने का क्या अर्थ है? ऐसे तमाम प्रश्न राजनीतिक भूदृश्य में एक नदी बेसिन की तर्ज पर निर्माण होती परंपरा एवं लगभग हर पल आती नवीनता इसके चुनौती के परिचायक हो सकते हैं।
राष्ट्र का निर्माण एक भूदृश्य तथा इतिहासिक पृष्टभूमि एवं साझे के विश्वास से बनती धरा है । जहाँ भिन्न -भिन्न राष्ट्रवाद एवं गहराते मानव संकट साथ-साथ उत्थान की प्रक्रियाएँ चलती रहतीं हैं।वहीं राष्ट्रवाद का खाका पहले ही स्पष्ट हो गया कि वह एक निश्चित भूभाग अथवा राष्ट्र या देश की आवश्यकताओं तथा उन्नत समाज के निर्माण हेतु बनाई गई एवं समयानुसार चलायमान प्रकृति जो अपने अर्थों में उस भूखंड के लोगों कि आशा आकांक्षोओं समेटे रहता है।
पंडित नेहरू अपनी प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखते हैं-" हांलाकि बाहरी रूप में लोगों की विविधता और अनगिनत विभिन्नताएं थीं,लेकिन हर जगह एकात्मकता कि एक गहरी छाप थीं, जिसे हमने युगों तक संजोए रखा।"
राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद का राजनीतिक महत्व,
-गरीबी,बेरोजगारी,महँगाई,जनसंख्या वृद्धि, आतंकवाद-नक्सलवाद,तथा हिंसा आदि पर नियंत्रण स्थापित करना तथा सामाजिक ,सांस्कृतिक,धार्मिक कल्याण हेतु नीति तथा कानून एवं उसमें राजनीतिक आत्मनिर्णय का होना आवश्यक हो सकता है।एक राष्ट्र एक राष्ट्रवाद राजनीतिक महत्व की बात होती है जहां पर व्यक्तियों ,संस्थाओं,एवं न्यायपालिका, कार्यपालिका को संविधान सम्मत चलना होता है। भारत ,अमेरिका, कनाडा,तथा फ्रांस के संवैधानिक परिस्तिथी इसके अनुकूल नजर आतीं हैं।
-किसी व्यक्ति या समाज का पिछड़ापन(सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक, सांस्कृतिक) राष्ट्रवाद की गरिमा को ठेश पहुंचाते हुए अवसर तथा भागीदारी का गला घोंट देती है।राजनीतिक दृष्टिकोण उसे सामाजिक न्याय, समानुपातिक न्याय, विशेष जरूरतों का विशेष ख्याल एवं आवश्यकता के साधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा करवाती है।
राष्टवाद का राजनीतिक प्रश्न बनते ही इसमें आयी पर्याप्त कमी तथा उठने वाले मुद्दे नित नए राष्टवाद की भावना को जाग्रत करती है।जिसप्रकार प्रौधोगिकी राष्ट्रवाद के नए शर्तों में सम्मिलित है राजनीतिक पटापेक्ष्य धरातल पर नए संसाधनों तथा कानूनों के माध्यम से एक राष्ट्र के राष्ट्रवाद को उजागर करती है।
चुनौतियां तथा परिणाम
- राष्ट्रवाद हमारा अंतिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकता। हमारी अंतिम शरणस्थली तो मानवता है। हम हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदेंगे,देशभक्ति को कभी मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने देने की चाह हम सबमें होनी चाहिए। चूंकि राष्टवाद का प्रश्न उठा यूरोप के कई टुकड़े हो गए,राष्ट्रवाद का प्रश्न उठा भारत के तीन टुकड़े हो गए। राष्ट्रवाद कभी भी देश पर हावी हो सकता है।
- विद्वानों का प्रायः यह मत है कि देश का अधिक लोकतंत्रिक होना या अत्यधिक क्रूर होना लोगों में आत्म निर्णय की परवर्ती को जन्म देती है। जिसका उदाहरण ब्रिटिश शासन से मुक्ति तथा स्वराज की चाह भी आत्म निर्णय था यूरोपीय देशों का विखंडन भी आत्म निर्णय। परंतु स्वराज प्राप्ति एक सकारात्मक आत्मनिर्णय रहा हो परंतु इसी आत्म निर्णय के पद पर सवार राष्ट्रवाद देश के आजादी के ठीक बाद ही आंध्रप्रदेश के रूप में पैदा हुआ,गुजरात और महाराष्ट्र के रूप में पैदा हुआ।
- मेरा यह मतलब नहीं की राष्टवाद गलत है चूंकि ,राष्ट्रवाद की परिभाषा का आशय यह बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि एक किसी अन्य राष्ट्र का राष्ट्रवाद ही अधिनायकवादी हो सकता है।इसके जगह पर स्थानीय जरूरतों तथा उससे राष्ट्रीय महत्व को कितना सुदृण किया जा सके यह अर्थ होना चाहिए।
डॉ .बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा था- न्यायपूर्ण समाज वह है,जिसमें परस्पर सम्मान की बढ़ती हुई भावना और अपमान की घटती हुई भावना दोनों मिलकर एक करूणा से भरे समाज का निर्माण कर सकें।
अर्थात एक गरिमामयी राष्ट्रवाद होना चाहिए जो मानवता के साथ चलें न कि उसके ऊपर।
यह लेखक के अपने विचार हैं
अजयकुमार(छात्र)
बालाघाट म .प्र.
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