बेरोजगारी

बेरोजगारी

समस्या तथा निवारण

पिछले दिनों बेरोजगारी की अताह जलराशि की बाढ़ सी आ गयी चारों ओर कोलाहल मच गया कहने लगे कि क्या समस्या विगत हो गई पर यह दौर विगत न होकर सास्वत चल पड़ा है।"कुशल अथवा कार्य करने हेतु सक्षम होने के बावजूद कार्य न मिल पाने को बेरोजगारी कहा जाता है।"

श्रमबल-कार्यबल =बेरोजगारी भी इसे समझा जा सकता है। 15से59साल के बीच आने वाले वह तमाम जनसमूह इसके अंतर्गत आती हैं। बेरोजगारी कई प्रकार की होती हैं प्रमुख रूप से शिक्षित बेरोजगारी ,अशिक्षित बेरोजगारी ,अप्रत्यक्ष बेरोजगारी तथा मौसमी बेरोजगारी प्रमुखता से हमें देखने को।मिलती है।

बेरोजगारी, बेकारी,भुखमरी,शिक्षा ,स्वास्थ्य,असुरक्षा, सामाजिक अपवर्तन ,निर्धनता प्रमुख रूप से संपोषणीय विकास को अवरुद्ध कर देती है। विकास ,प्रगति, सब मानव संसाधनों के कुशल अकुशल होने पर निर्भर करता है । बेरोजगारी एक ऐसी समस्या है जो इन सबके मार्ग में तलवार टांग देती है।


 आजादी पूर्व प्रमुख दो महायुद्धों ने सम्पूर्ण विश्व को अलग तरह से सोचने को बाध्य कर दिया तथा तमाम वैश्विक उपनिवेशिक शक्तियों को ये समझ मे आ गया कि वैश्विक व्यापार तथा कार्यकुशल जन का निर्माण कैसे किया जाय । प्रथम तो उन्होंने उपनिवेशिक पूर्व समाज को देखा जहां सभी लोग रोजगार परक सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़े हुए कार्यों को करके पारिवारिक नियोजन को चलाया करते थे परन्तु 1848 की औधोगिक क्रांति ने मसिनी युग प्रारम्भ करके विश्व को आगे सोचने को बाध्य किया जो अब पुरने अवसर दिखाई नहीं दे रहे थे । नए सिरे से राष्ट्रों को संगठित करने का प्रयास 1945 में un की  स्थापना तथा I.M.F जो सम्पूर्ण विकाशील देशों को प्रगति  सहायता प्रदान करता था।

भारत में संसाधनों  की परिपूर्णता परंतु  प्रौधोगिकी के अभाव ने आजादी के 75 साल तक बेरोजगारी की इस फेहरिस्त को बनाये रखने में महती भूमिका निभाई। ऐसा नहीं है कि हमने जनता को कार्यशील नहीं बनाया हमारी जनता ने देश के विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाई । परंतु  सकुशल कार्यसिलता की हमेशा से कमी रही ।  70 प्रतिशत जनसंख्या गांवो में निवास करती थी जो विकास की परिपाटी से काफी दूर रह गई जो प्रौधोगिकी के पर्याप्त आभाव ने इन्हें दूर ही रखा परिणाम स्वरूप बेरोजगारी की लंबाई और बढ़ती गई।

 
शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार ,तथा खाद्यान को प्रमुख रूप से बुनियादी ढाँचागत विकास का स्तंभ माना जाता है इन पर काफी रिसर्च हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री 'अमर्त्य सेन ने खाद्य असुरक्षा को बेरोजगारी का प्रमुख कारण माना।' उनके तर्ज पर कई प्रकार के नियोजन कार्य बफर स्टॉक,अंत्योदय योजना ऐसे कई कलयाणकारी योजनाएँ बनाई गईं । परंतु शिक्षा स्वास्थ्य तथा रोजगार ये हमेशा आम आदमी से काफी दूर रहे । इन तीनों को सरकारी नियोजन के अंतर्गत समझा जाता है परंतु वर्तमान में इनकी वास्तविक पृष्टभूमि देखें तो एक आम नागरिक तक इनकी सुविधाएं पहुंचने में बड़ी देर हो जाती है।

जैसे-० सरकारी शैक्षणिक संस्थानों पर हावी निजी संस्थानों ने गुणवत्ता के नए मानक खोल दिये हैं । जहाँ बच्चों को नई दुनिया तथा इस परिवेश में किस तरह तदात्म्य स्थापित किया जाय एक विशेष नियोजन के साथ सिखाया जाता है। इन गुनवत्ताओं से जर्जर मानसिकता से ग्रसित होते सरकारी शैक्षिक संस्थान मुकाबला नहीं कर पाते । गरीब तथा कमजोर वर्ग अपने बच्चों को अच्छे विद्यालयों में भर्ती नहीं करा पाते अकुशल कार्यबल का निर्माण होने लगता है । साथ -साथ पूँजीवादी सोच से ग्रसित शैक्षणिक प्रणाली नैतिकता का भी हास करती है,जो कार्यों के नैतिक परिपाटी का मूल्यांकन न कर पाना बेरोजगारी का प्रधान कारण है। 


० वर्तमान परिस्तिथियों को यदि देखें तो स्वास्थ्य क्षेत्र में कोरोना जैसी महामारी ने बड़ी भयावह स्तिथि उतपन्न कर दी है जिसकी वजह से असंगठित तथा प्रवासी मजदूरों की लाइफ लाइन ही खत्म कर दी है । स्वास्थ्य कारणों से अप्रत्याशित रूप से घर की ओर पलायन कर रहे जन प्राथमिक कार्यों की ओर अग्रसर हो रही हैं परंतु श्रमबल से अधिक कार्यबल लगा देने पर अप्रत्यक्ष बेरोजगारी का सीधा उदाहरण मिल ही रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में आई इस भयंकर महामारी ने बेररोजगरी का स्केल ही बढ़ा दिया पूर्व में चल रहे नियोजन कार्य तथा सरकारी निजी स्वास्थ्य केंद्रों में कम होती प्रतिस्पर्धा निजी स्केल का ऊपर जाना स्वास्थ्य कारणों ने गरीब तथा बेरोजगार जन की जान जा ही रही थी कि अब कोरोना ने अपार स्वास्थ्य हानि को आरोपित कर दिया।


० जैसे कि एक दूसरे का पर्याय रोजगार और बेरोजगारी प्रारंभ से ही एक दूसरे के पूरक बनने की कोसिस करते आये हैं। रोजगार की आस में पलायन करती जनसंख्या तथा मिल रहे रोजगार की गुणवत्ता में कमी ने वैसे ही लोगों को पलायन कर रखा था ऊपर से शिक्षित बेरोजगारी की समस्या हावी होती दिख रही है । प्राइवेटाइजेशन के बढ़ते कदम ने सरकारी नौकरियों पर बैन लगा रही है ,शिक्षित होते युवक भ्रमित हो रहे हैं कि आखिर में शैक्षणिक प्रणाली के प्रति हमारी बनी बनाई  मानसिकता पूंजीवादी सोच के भेंट चढ़ रही है या फिर सरकार का हमपर से भरोसा उठ गया है। सरकार के सामने लगातार रोजगार की आती समस्याओं जड़ से समाप्त करने के लिए कुशल युवाओं तथा कर्मशील जनसंख्या को निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाने तथा उद्दमि श्रमबल उत्पन्न करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं दिख रहा ।परंतु कार्यगति में प्रगति का केवल निजी स्वामित्व के आधार पर तथा इन संस्थाओं ,उद्योगों  को सरकार पर या सरकार का नियंत्रण स्थापित होना सुरक्षित रोजगार की उपलब्धता को परिभाषित करने की होड़ में है।


समस्याओं के घने बादलों के बीच छुपी आर्थिक महत्व की बाद भारत तथा उसके जन समूह में लगातार वृद्धि बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न करत्ते जा रही है। सरकार परिवार नियोजन तथा रोजगार उन्नयन की तरकीब कितनी लगाए  श्रमबल की तरलता तथा सृजन की प्रवर्ति का भारतीय जनमानस में होना बहुत जरूरी है। 

देश दुनिया की अर्थव्यवस्था बढ़ते कार्यकुशल जनसंख्या तथा उनमें प्रधौगिकी की समझ ने बेरोजगारी जैसी समस्या को एक झटके में खत्म कर देती है । परंतु भारत जैसे विशाल जनसांख्या को कार्यशील बनाना बड़ी डेढ़ी खीर है। सरकार NMP के तहत एसेट मोनेटाइजेशन, GST,प्राथमिक ,द्वितीयक तथा सेवा क्षेत्रों में युवाओं को सृजन शील बनाना चाहती है। परंतु बेरोजगारी की इस समस्या का हल बुनियादी विकाश ढांचे से ही आ सकता है । जैसे:० सरकार को  आम जन तथा विशेष रूप से गरीब तबको के लिए कल्याणकारी योजनाओं में बढ़ोतरी तथा उनके द्वारा किये जाने वाले कार्य को राष्ट्रीय मंच में प्रोत्साहित करना । उद्दम सृजन को प्रोत्साहित करने का सामाजिक प्रयास करना चाहिए।


० कार्यशील जन को प्रशिक्षु बनाना तथा उनके वेतन भत्ते तथा साप्ताहिक कार्य दिवस में कमी कर अन्य बेरोजगार युवकों को सम्मिलित करना ,नैतिकता तथा सांस्कृतिक कार्यों के माध्यम से परंपरा तथा आधुनिकता पर गठजोड़ बनाकर समायोजित विकास दर को प्रगति के रास्ते में लाते हुए पर्याप्त सुरक्षा तथा स्वास्थ्य,शिक्षा को बढ़ावा देना।


०सरकारी संस्थाओं, उपक्रमों,सहकारिता आदियों को आपस में संतुलित कर यह भरोसा बनाये रखना की निजीकरण जैसी विनाशकारी शब्दविधान के इतर भरोसेमंद तथा तरल और प्रशिक्षु अधिकारी कर्मचारियों की नियुक्ति करना ।


०युवाओं को विशेष रूप से प्रौधोगिकी से जोड़ना और उनमें उद्यमी बनने तथा कार्य सृजन करने की प्रवर्ति का विकास करना । भर्मित होते युवकों को सरकारी तंत्र में भरोसा बनाये रखने तथा सरकारी नौकरीयो की वैकेंसी की तरलता बनी रहे और इनमें उत्पन्न होने वाली बाधाओं का कठोरता से निवारण ,और  रिक्त पदों की सीघ्र भर्ती और वे तमाम कारण जिनके वजह से आज करोङो युवा बेरोजगार हैं निवारण करना।


०महिलाओं को कार्यशील जनसंख्या में शामिल करना तथा उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों को प्रोत्साहित करना । निजी कंपनियों फैक्ट्रियों में काम कर रही महिलाएं अक्सर शिशु अवकाश के लिए जूझती हैं सरकार को ऐसा तंत्र बनाना चाहिए जिसपर निजी तंत्रो पर अप्रत्क्ष रूप से शिकंजा हो। बच्चों के पोषणीय विकास के लिए प्रोत्साहन राशि में अभिवृद्धि की जानी चाहिए।


० लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृण करना ,चुनाव के दौरान पटल पर किये जा रहे वादों की अहर्ताएँ तथा राजनेताओं पर चल रहे भ्रस्टाचार तथा अन्य मामलों को तेजी से निपटारा जिससे कि जनसमूह का कानून पर भरोसा बना रहे। 

अतः वह तमाम कारण जिनसे बेरोजगारी तथा रोजगार न मिल पाने की समस्या बनी रहती है।


बेरोजगारी के इस युग को रोजगार के पथ पर लाना केवल और केवल सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी न होकर आम जन की सोच तथा कार्यबल की उपलब्धता को बढ़ाना है जो हमारी मानसिकता पर निर्भर करता है । अन्य विकसित राष्ट्रों में बेरोजगारी के स्केल में जिस तरह प्रमुख रूप से कृषि कार्यों में करशील जनसंख्या को सेवा क्षेत्रों तथा द्वितीयक क्षेत्रों में स्थानातरित करके कार्यबल को संतुलित किया है हमे भी ऐसा कुछ करना चाहिए। अनेकता में एकता संकट के दौर को परिभाषित करती है उसे इस दौर में प्रयोग कर हम निश्चित ही इस समस्या से निजात पा सकते हैं।


यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं।

अजय कुमार 

(एक बेरोजगार युवक तथा चिंतक)

जिला बालाघाट-मध्यप्रदेश।


 

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