"उलूल- जुलूल" विधा-निबंध

 लिंग समानता की बहती धारा में उभार तल के उबड़-खाबड़ का प्रमुख दोष सदियों से पोषित इस मानव समाज में पनपता रहा । आज के संदर्भ में लिंग असमानता की गहरी खाई प्रशासनिक शब्दावली में भर रही है ,जहाँ मानवाधिकार को लेकर रोज नए मांग के बीच कानून का बढ़ता कागजी रूप फिर उसकी जमीनी पृष्ठभूमि स्पष्ट है।

लड़का -लड़की का रूप आगे जाकर विभिन्न सम्बधों में बंधते हैं वहीं संबंधों के आड़ में पुष्ट होती पितृसत्तात्मक समाज इसके आंतरिक विरोध के नए आयाम बुन रही होती है। विरोधाभाष के दौर में समानता की गाड़ी बड़ी तेजी से समाज ,क्षेत्र,कस्बा,राज्य से लेकर पूरे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रही है ,परंतु पुष्ट होती मानसिक असमानता का दायरा भी स्पष्ट है ।


'माँ-बाप के नाजायज़ संबंध बच्चों के  बचपन के साथ पूरी जिंदगी में सेक्स का सामान्यीकरण या यों कहें साधारणीकरण होता दिखता है,जो एक प्रमुख समस्या बनकर आज के समाज में स्थापित हो चुकी है।' 

स्वतः संबंध चाहे वह स्त्री हो या पुरुष अपने शादी पूर्व जीवन काल में बना सकता है इसकी पूरी छूट कानून देती है जिसका भरपूर फायदा कामोबेस शादी के बाद भी स्त्री और पुरुष में दिखाई देता है। जहां भाग दौड़ की जिंदगी के बीच स्त्री- पुरूष के मध्य समान कानून जिसके चलते वे अपनी स्वतंत्र जिंदगी जहाँ चाहे वहाँ बिता सकता है/सकती है। जो उसे केवल काम के अलावा वैवाहिक संबंध के साथ समझौता का प्रस्ताव देती है । जहाँ विवाह पूर्व प्रेम या फिर विवाह पश्चात प्रेम का दोहरा नाटक  स्त्री पुरुष के लिए आसान हो जाता है जिसका परिणाम विवाह विच्छेद से लेकर कई गतिरोध होते हैं जिसका सबसे ज्यादा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ता है।

 

"एक अकेली और असहाय लड़की को सहारा मिलना एक चमत्कार तथा उसमें निहित अचमत्कारत्व की गहरी पैठ भृष्ट विचार और असमानता की ओर होती है।"

एडॉप्शन आज के जीवन शैली में बहुत ही मधुर तथा मानवाधिकार को अधिक पुष्ट करती है । परंतु अडॉप्शन की शैली में ही एक बच्ची न होकर एक अनाथ लड़की या स्त्री को सहारा मिलना पर्याप्त कारण से ही होता है। मैं मानता हूं कि सकारात्मक भी हो सकता है परंतु वैचारिक पृष्टभूमि वह पुरुष या स्त्री जो उसे आश्रय या यों कहें संयोग प्रदान करतीं हैं/करते हैं क्या होगी। प्रायः देखने को मिलता है यह अवस्था तलाक के पश्चात पुनः वैवाहिक संबंधों में अधिक दिखाई देती है यह आवश्यक नहीं कि तलाक सुदा स्त्री या पुरुष को तलाक सुदा स्त्री या पुरुष मिले । संबंधों में आपसी खटास कुछ समय के पश्चात आतीं हैं परंतु स्त्री पक्ष को अधिक सहज और असहज दोनों ही स्तिथि में अधिक संयम  बनाय रखने की आवश्यकता पड़ती है। किसी अनाथ लड़की को आश्रय मिल जाना भी सार्थक होता है परंतु उसमें छुपे वैमनस्य कामरूप का गहरा भाव भी कुछ समय मे उटघटित हो जाता है जो शोषण न होकर एक बार्टर सिस्टम बन जाता है यह प्रायः  माँ बाप के अनुपस्तिथि में एक बहन के साथ में दूसरी बहन का उसके घर अर्थात ससुराल में रहना ,संयोग से आश्रम में रहने वाली स्त्री को आश्रय मिल जाना । केवल इसमें सकारात्मक पक्ष के अलावा उपरलिखित समस्याएं भी रहतीं हैं।


"पेड़-पौधों से मनमोहक संबंध तथा मनुष्य का स्वार्थलाभ , प्यार स्नेह का परिवर्तित होना ,नग्न स्त्री तथा नग्न पेड़(उसके फल ,फूल,टहनी,आदियों को काट लेना)से बराबर संबंध है।"

जैसे छोटे से पौधे को बड़े प्यार से मनुष्य उगाकर बड़ा करता है रोज ध्यान रखता है कहीं उसे किसी बाहरी वस्तु ,व्यक्ति या फिर जीव -जंतुओं से हानि न पहुंचे। परंतु जब वह विशाल रूप धरता है फिर वही मनुष्य जो उसे बाहरी क्षति से बचाता है ,खुद काटकर उसकी टहनियों ,पत्तों,फलों तथा तने को काटकर बचे भाग को नग्न कर देता है। ठीक उसी प्रकार एक स्त्री की भी दसा होती है।


"अक्सर कम बोलने वाली स्त्री आदतन कुछ और हाँ या न के अलावा कुछ नहीं बोल पातीं । पुरुष के विपरीत समय में साथ तथा उसके कद में हुई अभिवृद्धि के कारण आस्था के स्वरूप भगवान के सामने हाँ या न के अलावा कुछ ज्यादा बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं । यदि जुटा भी लिया तो स्वयं को कभी गलत पाकर झुलस जाती हैं।"

आदतन मजबूरी कहें या फिर कुछ और मगर हर किसी की शैली महानगर में रह रही महिला के समान नहीं होतीं कुछ कम बोलकर ही अपना गुजारा कर लेते हैं ,कुछ ऐसा दबाव में या फिर आदतन ऐसी होतीं हैं । पुरुष के साथ संबंध चाहे वह वैवाहिक हो या फिर विवाह पूर्व प्रेम अक्सर कुछ लोगों में यह गुण पाया जाता है। जिसका पर्याप्त असर लड़का या लड़की के मानसिक सफर पर होता है जो वह सामने वाले पुरुष से लगातार शोषित होती रहती है उसे वह भगवान मान लेती है परंतु  विश्वास हो जाने पर की वह भगवान नहीं है स्वतंत्रता की गुहार भरने लगती है जो सार्थक है । परंतु क्या इसके पीछे केवल उस पुरुष का दोष है जो लगातार उसका वैचारिक स्तर पर शोषण किया या फिर उस महिला का जो उसने ऐसा करने दिया यह तो आप लोग स्पष्ट समझ गए होंगे।


"प्यार की अमरत्व की चाह ,जवानी के अमरत्व में विश्वास जितना ही हास्यपद है।"

प्यार की गहरी आश में स्त्री या पुरुष पूरे जीवन भर नए -नए आयाम गढ़ते हैं । कभी रील लाइफ और रियल लाइफ के सारे अंतर को पार कर देते हैं तो कभी राजा महाराजाओं की प्रेम कहानी से बड़ी कहानी लिख देते हैं । मेरा कहना यहां बिल्कुल ही दुष्कर नहीं  होगा क्योंकि प्रेम में तर्क का कोई स्थान नहीं है । यदि तर्क का प्रयोग स्त्री या पुरुष लड़का या लड़की करत्ते हैं तो अवश्य वर्तमान में मिल रहे सफलता से खुश हो सकतें हैं परंतु भविष्य में वे प्रेम का बिखरा रूप ही देख पाते हैं । घनानंद का प्रसिद्ध दोहा-

"अति  सरल सुदेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बांक नहीं,

घनानंद प्यारे सुजान सुनों जहाँ एक ते दूसरों बांक नहीं,

तुम कोंन छो पाठ पढ़ी हो कहो मुह लेहु पे देहु निसंक नहीं।"  


यही अमरत्व है ,परंतु यदि  तर्क के साथ इसका प्रयोग या व्यवहार किया जाय तो जवानी में अमरत्व की चाह जैसी हास्यापद हो जाती है। यह गलती केवल पुरुष ही नहीं स्त्री भी करतीं हैं चाहे वह विवाह पश्चात हो या विवाह पूर्व।


"औरतों से उनकी मनकी बात जानने के लिये उनके साथ सोना जरूरी समझा जाने लगा है ,इसी कारण स्त्री जिंदगी भर अपराध बोध की जिंदगी जीती रहती है।"

जैसे मैने ऊपर कहा कि कुछ स्त्रियां आदतन कम बोलने वाली ,भोली भाली होतीं हैं जिसका इसतरह से संबंध बनाकर बात जानना जरूरी समझा जाता है । साथ -साथ यह भी सत्य है कि एक ऐसा भी समाज है जहां स्त्रियां इसतरह से पुरुष को केवल भोग समझतीं हैं । प्रायः यह दृश्य देखने को मिल जाता है परंतु उसकी कोई कानून या फिर पुरुष ही नही चाहता किसी प्रकार कानून हो और वहां उसका ईगो हर्ट हो। 


"विवाह पूर्व प्रेम में आजकल देखा जाता है  की  महिलाओं की तुलना में पुरुषों की मानसिक ,आर्थिक तथा सामाजिक हानि अधिक हो रही है।"

यह कहना बिल्कुल विरोधाभास लग रहा है परंतु यह पर्दे के पीछे छुपी सच्चाई है। जहाँ प्रेम विच्छेद के पश्चात लड़का उस दौर से गुजरता है जहां उसे आर्थिक आभाव के कारण बेरोजगारी का बड़ा शिकार होना पड़ता है जो देश में पर्याप्त है । कहा जाता है बेरोजगारी का कारण शिक्षा के दौरान न मिलने वाली नौकरियों से  है परंतु क्या  वह व्यक्ति मानसिक रूप से उस रोजगार के लिए उतना तैयार होता है जितना कि उसे होना चाहिए नहीं। आज के समय में लड़कियों का सिलेक्शन हर एग्जाम में लड़कों की तुलना में अधिक होता है जो इसका इसका स्पष्ट उदाहरण है।


मेरा मानना है कि उलूल -जुलूल ,के इस दौर में केवल मानसिक क्षति ही नहीं ,पारिवारिक,सामाजिक,आर्थिक,असमानता का दौर भी स्त्री पुरुषों के मध्य अधिक हो गया है ।

सास्वत चलती आ रही स्त्री विमर्श और उसमें उनके साथ हुए अपराध का खुला मंचन हुआ । परंतु "परुष विमर्श" की किसी ने बात नहीं कि जो पर्दे के पीछे चालू है । सायद इसका कारण पुरुष ईगो हो जो वह दिखाना नहीं चाहता । भारत जैसे  बड़े आबादी वाले देश में मजबूत और तर्कपूर्ण यूआ चाहे वह स्त्री हो पुरुष कम नहीं है जिसका कारण पूरी तरह से शिक्षा पर मड दिया जाता है परंतु कुछ सामाजिक पृष्टभूमि हैं जो आज उभर कर सामने आईं हैं यह भी पर्याप्त कारण है।

अर्थात स्त्री विमर्श के साथ -साथ पुरुष विमर्श जैसे विषयों पर बात करने की आवश्यकता है ,जहाँ  इस युग में दोनों ही स्त्री तथा पुरुष समान रूप से आगे बढ़े । माना कि आज स्त्री समर्थित कड़े कानूनों की आवश्यकता है परंतु वहीं समर्थ मानवाधिकार की भी आवश्यकता है जहां दोनों को बराबर की परिपाटी में समझा जाए। एक विशेष दृस्टि की आवश्यकता तब होती है जब वह समस्या या वस्तु किसी सामान्य मनुष्य या वस्तु को दिखाई नहीं देती ,परंतु समस्याएं स्प्ष्ट है अब केवल स्त्री ही नहीं पुरुष तथा ट्रांसजेंडर की भी बात होनी चाहिए। केवल कानूनन पृष्टभूमि में न होकर नए -नए विचारकों के दृस्टि में जो इसे वाद -विवाद का विषय बनाये और इसपर विशेष चर्चा करें।

यह लेखक के अपने विचार हैं,

निबंध,"उलूल-जुलूल"

लेखक-अजय कुमार,

हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्विद्यालय।

6मार्च 2021




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