विवाद(सम्बधों में आपसी खटास और प्रेम की अमिट धारा)
एक फुररर...फुररर..सी होती आवाज मेरे कानों से नज़रें चुरा ले गई । मेरी इंद्रियां उसके स्पर्श मात्र से जैसे झंझहनाई सी मध्य में अपने -अपने रेसिडेंस से निकलकर आ ही गए । कहने लगे क्या *इन्द्रियाँ*- तुम्हें पता है कि कहीं पुरवाईयों की बहकती आवाज तंद्रा सी बिल्कुल ज्वालामुखी में उद्गार होते गर्म लावा सी तेरे कानों में आकर जैसे तुम्हें गुलाम बना लिया है।
*मेरा प्रीत*- आपस में बात करते हैं,अपना मन लिया और लेकर मेरा नाम कहीं से भी आते शोर को तुम उसका नाम कहोगे,पल-पल मेरी रुन्धती हुई आवाज,शायद तुम्हें नागुजर हो गए होंगे,कहो इसीलिए तुम मुझे निकाल देना चाहते हो।
*इन्द्रियाँ*- न ,जी न हमारा बिल्कुल ऐसा मतलब नहीं था ,वो रश्में हैं जो शायद तुम्हारे रूह को पलटने की ताकत रखतीं हैं,जो बार -बार तुम्हें तड़पाकर तुम्हारे राह बुनती हैं,पर जो आज हमने सुना और जैसा महसूस किया है ,बिल्कुल ठीक वैसे जो तुम्हें अक्सर नया लगता है। ओह......,
*मेरा प्रीत*- भला तुम्हें क्या मालूम और कैसे ?जो मुझे लगता है सच तो यही है कि मेरी रुधन आपलोगों को बाधित करतीं हैं,अपनी मनमानी के चलते मैंने आप लोगों का जीना हराम कर दिया है।आपमें कोई नही होगा जो दिन बढ़ती मेरी कमजोरियों के साक्षी न हुए हों और इनसे आपके चैन ,शुकुन हव्वा न हुआ हो। मेरी तकलीफें मुझे खुदके अंदर ही दफ़नानी होंगीं, क्यों मैं इस तरह बेवजह उगल देता हूँ मुझे समझ नहीं आता।
*इन्द्रियाँ* - मगर क्या हमारे संयोग से तुम्हारे रास्तों की अड़चनें बढ़ रहीं हैं?ऐसी सोच तुम्हारी क्यों बन रहीं हैं? हमारी जिंदगी के तले तुम्हारा फुसफुसाता बचपन लौट आये,तुम्हें हँसता देख हमारी आंखें नम हो जाये। क्या तुम्हें पता है दुख और सुख में तुम्हारी हंसी और रुधन के तले आंखों का भर आना ,होंठों का थरथराना ,ज्वालामुखी सा लावा जब बाहर निकलता है उस वक़्त हमारा प्रीत,कैसे भंग हो जाता है।क्या तब हम तुम्हें छोंड़ देते हैं?
नहीं। फिर किस अनमने ढंग की बात करते हो तुम प्रीत में संग -संग में प्रीत बढ़ती धडकनों के बीच ,जब आज पुरवइयां सी तुम्हारी याद 'वो' इस रूप में आई है ,तब क्या हम खुशियों की बौछार नहीं करेंगे।इसे अन्यत्र न लो मित्र सुख की डलिया जब घटने लगती है तब तुम्हारे रुधन से पहले हमारी रुधन आसमां छू लेतीं हैं। अंततः शाश्वत सत्य के बीच मोक्ष प्राप्ति के दौरान देखना त्याग की इस सीमा में सबसे पहले हमारी आहुति होगी।
*मेरा प्रीत *- माफ करना मित्र मैं दोस्ती की अहमियत नहीं जानता, मगर क्या करूँ समझ की इस दरिया में डूबकर भी भीग न पाया । समुद्र से भी बढ़कर आसमान छूती दरिया कू देख न पाया,मेरे प्रीत की बहती एक सूक्ष्म सी धारा आसमान छूती इस दरिया कू भेद रही है।पानी से भरे घड़े में एक महीन छिद्र कुछ अधिक समय में घड़ा खाली कर देता है फिर मेरी नम आंखें उनमें अपनी नमकीन यादें घोल देतीं हैं।
मैं इतना समझदार व्यवहार कुशल तो नहीं मगर प्यारे, प्रीत की नमकीन माला पिरोकर समझ की इस अथाह महासागर को प्रीत की माला पहना देना चाहता हूँ।
लेखक ,
अजय कुमार
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