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लव जिहाद तथा सम्प्रदायवाद की झलक,
भूमिका:
लव जिहाद दोनों शब्द लव तथा जिहाद लगभग विपरीत हैं परंतु भाव लगभग समान ,अंग्रेजी का शब्द लव का हिंदी में अर्थ 'प्यार' होता है ,आमतौर पर आज इसकी प्रासांगिगता बहुत है चाहे वह दो प्रेमी युगलों के मध्य हों या फिर अन्य रिश्तों के मध्य आपसी समरसता और अमन शांति के लिए अर्थात मानवता की स्थापना के लिए 'प्यार' बहुत आवश्यक है ।अंग्रेजी का ये लव आजकल फैंटेसी के अर्थों में लिया जाने लगा है जहां ढेर सारा विलास मौजूद है।
- जिहाद ,अक्सर जिहाद कहते ही हमारे मन में आंतकवाद और उसके धुर्वी अर्थ पाकिस्तान जम्मू -कश्मीर का दृश्य दिखाई देने लगता है । परंतु अरबी का यह शब्द 'जिहाद' जो अपने अर्थ में किसी विशेष प्रसंशनीय उद्देश्य के लिए संघर्ष करना होता है। चूंकि आज के परिपेक्ष्य में इसके दो अर्थ लिए जाते हैं,पहला 'जेहाद अल अकबर' जिसका शाब्दिक अर्थ अहिंसात्मक संघर्ष जो समाज में फैली बुराइयों और मुख्य रूप से स्वंय के अंदर मौजूद बुराइयों के खिलाफ लड़ना। दूसरा, 'जेहाद ए असगर 'का उद्देश्य इस्लाम के लिए संरक्षण करना होता है,जब इस्लाम को मानने की आजादी न दिया जाय उसमें रुकावटें पैदा की जाय तो उसके खिलाफ लड़ना।
- लव जिहाद का इतिहास 2009 के केरल हाईकोर्ट के फैसले से आता है जिसमें धर्मांतरण के लिए प्यार करना या धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से प्यार का जाल बिछाना लव जिहाद कहलाया,जो आज -कल बड़ी सुर्खियो में है। लव जिहाद एक सामाजिक समरसता के मध्य साम्प्रदायिकता की नींव रखती है जिसके अनेक पहलू हैं।
०लव जिहाद से 'साम्प्रदायिकता 'एक चुनौती:
- लव जिहाद प्रमुख रूप से दो पक्ष का निर्माण करती है एक पक्ष जिसमें पूरा मुश्लिम सम्प्रदाय है और दूसरे पक्ष में हिन्दू ,सिख ,ईसाई, बौद्ध और अन्य सभी सम्प्रदाय। जहां 'प्रेम ' जैसी अनूठी और मार्मिक भाव का प्रयोग इस कुंठित मानसिकता से की जा रही है कि इससे अप्रत्याशित मात्रा में धर्म परिवर्तन कराया जा सके। चूंकि यह कहाँ तक सार्थक है यह इसी शब्द में ही छुपा हुआ है, कि प्रेम और फिर विवाह संबंध,क्या सुरुआत से ही फरेब और जाल साजी से इतनी सरलता से जुड़ जाती है? यह तो सुप्रीम कोर्ट ही सिद्ध करेगी।
-लव जिहाद भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश जहांके संविधान में सभी धर्मों को प्रेम और आदर्श दिया जाता है ।क्या लव के साथ जिहाद शब्द आंतरिक रूप से आतंकवाद को बढ़ावा देगा । इन सब सवालों के घेरे में साम्प्रदायिकता की पेंच फंस जाती है। जो कि आंतरिक शांति और स्थिरता को झगड़े -लड़ाई ,मार-काट आदि में परिवर्तित कर देती है जिससे हम भली -भाँति परिचित हैं।
-एक ओर जहां मुश्लिम समाज है वहीं दूसरी ओर अन्य सभी समाज जो एक प्रकार से धुर्वीकरण जैसा माहौल बनाकर काउंटर अटैक मुश्लिम सम्प्रदाय को लगातार चाहे वह ट्रिप्प्ल तलाक ,आतंकवाद, या फिर लव जिहाद का मुद्दा क्यों न हो अटैक पर अटैक कर रही है जो सार्थक है जो गलत है उसका विरोध हो ये हमारा संविधान और कुरान भी ये बात कहता है। यहां फिर कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं, क्या आतंकवाद मुश्लिम सम्प्रदाय ही फैलाती है उसके तले चलने वाले नक्सलवाद ,उग्रवाद ,नस्लीय भेदभाव का अस्तित्व लगातार बढ़ना क्या कोई प्रश्न नहीं?जहां तक लव जिहाद की बात है क्या धर्मांतरण केवल मुश्लिम समाज कराती है अन्य सम्प्रदाय के मध्य धर्मांतरण का इसमें कोई रोल नहीं है? ये अनेक प्रश्न खड़े हो जाते हैं जो सिद्ध करता है कि जानबूझकर समस्यों पर बात करने या फिर उसपर विचार -विमर्श करने में दोगले पन का मिजाज साम्प्रदायिकता है जो मुस्लिम समाज पर अन्याय है।
-धर्मांतरण या लव जिहाद एक दूसरे के पूरक हैं ,धर्म ,जो धारण किया जा सके इसके पीछे कोई विशेष योजना न रहे यह धर्म की सार्थकता है । जहां तक प्रेम फिर विवाह और फिर लड़का या लड़की का धर्म परिवर्तन करना ,कोई गलत बात नहीं है यदि वह चाहते हैं कि धर्म परिवर्त्तन किया जाय । परंतु यदि संरचनात्मक रूप से परिवर्तन कराया जाना ये तो प्रत्यक्ष रूप से गलत है जिसकी परिणति धर्मांतरण कर रहे वे युगल भी जानते हैं। पर क्या हर हिन्दू मुश्लीम लड़का या लड़की के सम्बंध को इस दृष्टि से देखा जाना कि ये केवल मात्र लव जिहाद है सार्थक नहीं,यह नागरिक अधिकारों का हनन है ,और प्रत्यक्ष रूप से साम्प्रदायिकता का पनपता रूप है।
निष्कर्ष:
-लव जिहाद सामाजिक समरसता के लिये बहुत बड़ा खतरा है यह एक समस्या और समाधान के पश्चात उत्पन्न सामाजिक दूरी का निर्माण भी करती है। जो हिन्दू ,मुश्लिम,जैन,क्रिश्चन, सिख,बौद्ध आदि सभी में एक दूसरे से संबंध जोड़ने वाली पवित्र मार्ग विवाह में परेशानियां उत्पन्न करती है।
- साम्प्रदायिकता जैसे भयावह बिंदु पर विचार -विमर्श न जाने कितने अरसे से की जा रही है परंतु इन्ही समस्याओं पर आकर उलझ जाती है । जो आतंकवाद,सम्प्रदायवाद और भेदभाव उत्पन्न कर आये दिन मानवता का गला घोंटती रहती है।
यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं।
अजय कुमार(सामाजिक कार्यकर्ता तथा विश्लेषक)।
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