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स्त्री पुरुष संबंधों के मध्य यौनिकता का फँसता पेंच
भूमिका
-सनातन काल से जैविक सम्बन्धों में स्त्री पुरुष के मध्य संबंधों के सूत्र प्रारंभ हुए जिनमें पति -पत्नी का संबंध सबसे उत्कृष्ट माना गया। प्रारम्भ से लेकर अबतक इन संबंधों के मध्य अनेक संबंध जैसे भाई-बहन ,चाचा-चाची,दादा-दादी,नाना-नानी,मामा-मामी,भैया-भाभी, जीजा-दीदी,भांजा-भांजी,आदि अनेक संबंधों का निर्माण हुआ।
- संबंधों में कई तरह की निकटता आई जो आजके वर्चुअल वर्ल्ड ने उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचा चुकी है,परंतु संबंधों में गंभीतरता तथा ओछे पन का दौर भी बलवती हुआ है जिसका कारण भाग दौड़ की जिंदगी जहाँ प्रत्यक्ष संवादहीनता की कमी दिखाई देती है और साथ -साथ यौनिक संबंधो का बढ़ता दायरा।
-यौनिकता एक ऐसा संबंध है जिसे विवाह उपरांत उत्कृष्ट माना जाता है तथा विवाह के पूर्व इसके संबंध में कई विरोधाभास बातें चलती हैं।
-यौनिकता का बढ़ता दायरा:
- अतिस्योंक्ति नहीं होगी कि आज के दौर में तमाम संबंधों के मध्य यौनिकता का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। जिससे समरसता का निर्माण पति-पत्नी के मध्य सम्बन्ध शिशु की चाह रखने तथा इसके साथ-साथ पारिवारिक कद में बढ़ोतरी और तथाकथित यौनिक संबंध की मुखरता पति पत्नी के मध्य आवश्यक माना गया है।
- यौन शोषण जैसे कुष्टित मनोविकार की प्रबलता आये दिन नए -नए उदाहरण पेश करती है जो पुरुषों के मध्य महिलाओं के प्रति गिरते सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है। ये न केवल दृश्टिकोण के स्तर पर बलिक वे तमाम मानसिक विचारों पर असर डालती है जहां महिलाएं बाल्य अवस्था में ही स्वयं को एक स्त्री मान लेती हैं।
- प्रेमी युगल में प्रायः यह देखने को मिलता है कि संबंधों में असमय दरार स्त्री पार्टनर का यौनिकता से दरकिनार होना । साथ -साथ प्रेम की वास्तविक परिभाषा ही इससे निर्मित होती है कि प्रेम में यौनिकता, संबंधों के मध्य खाई उत्पन्न करता है और एक दूसरे के मध्य मौजूद प्रेम के वे सभी कारकों को उनसे काफी दूर कर देता है। उन प्रेमियों को इससे इत्तेफाक रखना चाहिये कि प्रेम में सेक्स(यौनिकता)आवश्यक नहीं।
- सुरक्षा का अहसास प्रायः असुरक्षा के दायरे में चल पड़ा है,यौनिकता की भयावहता ने स्त्री पुरुषों के मध्य एक ऐसी मिथक बना दी है कि शारीरिक सुख के बिना स्त्री- पुरुष संबंध चल नहीं सकते। चूंकि इसकी कामना स्त्री पुरुष दोनों की ही होती है परंतु इससे संबंधों में प्रगाढ़ता कैसे आये और इसकी अनुपस्तिथि मात्र से दुष्प्रभाव की आसंखा कम हो इसपर काम करने की आवश्यकता है।
- सोशल मीडिया ,मीडिया और फ़िल्म जगत के विभिन्न पहलुओं ने इसपर प्रमुख प्रभाव छोड़ा है ,यौन सामग्री की प्रचुरता ,सामाजिक स्तर पर यथार्थ की फैंटेसी का एक ऐसा चित्रण किया जाता है कि दर्शक मात्र इसे यथार्थ समझकर अपने मन में ही यौनिकता का एक समाज बुन लेता है।लगातार बढ़ते वेब जाल ने जहां व्यापार का नया पेशगी पेश कर रहा है जो वस्त्र के अंदर शरीर के आंतरिक भाग का चित्रण बड़ी बेशर्मी से हमारे सामने ला रहा है।आधुनिक समाज में बढ़ते सोशल प्लेटफॉर्म और वर्चुअल वर्ल्ड ने 7 साल के बच्चे से लेकर मृत्यु पर्यंत व्यक्ति तक इसकी पहुँच यौनिक भयावहता हमारे के लिए चिंता का कारण है।
-निष्कर्ष:
- मनुष्य का मनुष्य से और अन्य जीवों के अपने- अपने प्राकृतिक स्तर पर यौन संबंधों का दायरा है जो स्वभाविक भी है क्योंकि उनकी संख्या में वृद्धि उनके समुदाय को प्रगाढ़ करती है और जिम्मेदारी को भी बढ़ाती है। परंतु यौनिकता का कोई दायरा न होना मनुष्य को पसुता के दायरे में लाकर खड़ा कर देती है।
- एक सकारात्मक विचार व्यक्ति से होकर समाज की प्रगतिशिलता को बढ़ा देती है ,वहीं एक कुष्टित मनोविकार समाज के पूरे धड़े को नष्ट कर देती है। आवश्यकता है कि कानून के स्तर में परिवर्तन तो हों साथ -साथ सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता आये क्योंकि असली कानून तो समाज ही बनाता है ।स्त्री केवल सामाजिक वस्तू न होकर समाज की नींव है यदि वो परेशान रहेगी तो स्वाभाविक है समाज परेशान रहेगा।
किसी विद्वान ने कहा है-"अगर तुम स्त्रीयों को नहीं समझ सकते तो तुम्हें कोई अधिकार नहीं है स्त्रीयों को गलत कहने का।" यह कथन स्त्री विमर्श को समझने के लिए बहुत है।
यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं।
अजय कुमार(सामाजिक कार्यकर्ता एवं विश्लेषक)।
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